आस्था की अटूट डोर: डेलची बुजुर्ग में मां हिंगलाज का दर, जहां अंगारों पर चलकर पूरी होती हैं मन्नतें
उज्जैन जिले के महिदपुर तहसील के एक ऐसे गांव में, जहां सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। ग्राम डेलची बुजुर्ग—एक ऐसा स्थान जहां भक्तों की अगाध श्रद्धा उन्हें धधकते अंगारों पर चलने का साहस देती है। रंगपंचमी के पावन अवसर पर यहां का नजारा देखने लायक होता है, जब हजारों भक्त मां हिंगलाज के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने पहुंचते हैं।
महिदपुर का ग्राम डेलची बुजुर्ग इन दिनों भक्ति के रंग में सराबोर है। यहां स्थित है मां हिंगलाज माता का वह प्राचीन मंदिर, जिसे लेकर मान्यता है कि यह स्थान सदियों पुराना है। मां हिंगलाज, जिन्हें शक्ति का अवतार माना जाता है, उनके भक्तों का विश्वास इतना गहरा है कि वे रंगपंचमी पर ‘चूल’ चलने की कठिन परंपरा का निर्वाह करते हैं।
भक्तों का मानना है कि मां हिंगलाज के आशीर्वाद से दहकते अंगारे भी फूलों की तरह शीतल हो जाते हैं। स्थानीय निवासियों और आसपास के गांवों से आने वाले दर्शनार्थियों का कहना है कि मां के दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता। यहां मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। सरपंच कैलाश वर्मा ने बताया
“हमारी मां हिंगलाज बहुत दयालु हैं। हम पीढ़ियों से देखते आ रहे हैं कि रंगपंचमी पर चूल चलने की परंपरा निभाई जाती है। मां की कृपा है कि आज तक किसी को एक खरोंच तक नहीं आई।”
इस मंदिर की एक और बड़ी विशेषता इसकी तुलना पाकिस्तान स्थित मुख्य शक्तिपीठ से की जाना है। कहा जाता है कि दुनिया में मां हिंगलाज के दो ही प्रमुख स्थान हैं—एक जो सरहद पार पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित है और दूसरा हमारे इसी ग्राम डेलची बुजुर्ग में। यही कारण है कि इस क्षेत्र के लोगों के लिए यह स्थान किसी महातीर्थ से कम नहीं है।
श्रद्धा और विश्वास का यह संगम हमें बताता है कि भक्ति में कितनी शक्ति होती है। डेलची बुजुर्ग का यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि हमारी प्राचीन संस्कृति का एक जीवंत उदाहरण भी है।







